Saturday, February 20, 2010

हम यू जीते है

हम यू जीते है, जीना भी खता हो जैसे,
ज़िंदगी सिर्फ़ गुनाहो की सज़ा हो जैसे!

मेरी खुशियाँ छीन कर हवा ले गयी मस्तानी,
जीवन की इस्थीर मंज़िल पर सिर्फ़ उदासी छोड़ गयी है!!

चाहा था फूलो का सौरभ पर काटो ने उलझाया है,
कलियाँ मेरे उपवन का रिश्ता पतझड़ से जोड़ गयी है!!

तेरी यादो से जो दूर रहू क्या बचेगा मेरे जीवन मैं,
मेरी हर साँस तुझ से जिंदा है, वरना क्या है मेरी धड़कन मैं!!!!


Regards,
Rajender Chauhan
http://rajenderblog.blogspot.com

Friday, January 8, 2010

वीरानिया

दोपहरी मैं जब रेत तपती है, धूप चटकती है !
आके जुबा पे बात रुकती है, आवाज़ भटकती है!

लाश बनकर भी जीना पड़ता है इंसानो को!
जब तक मौत नही आती सांस खटकती है!

जिंदगी के रेगिस्तान मे, न हो प्यार की बारिश अगर,
मौसम की बारिश जब बरसती है, आँख बरसती है!!

कुछ लोगो को तो जीना भी रास नही आता!
घर नही होता, जेब नही होती,भूख तो लगती है मरते दम तक!
जब नही होती एक तमन्ना पूरी,कयामत तक कहाँ-कहाँ, कोई रूह भटकती है!
किनारे पर आकर, जब डूब जाती है किस्ती,एक शक्श के बिना ये दुनिया वीरान सी लगती है!!

Another tribute to my mother!!


Regards,
Rajender Chauhan
http://rajenderblog.blogspot.com